वर्ष - 32
अंक - 27
02-07-2023

संथाल परगना का दुमका जिला झारखंड के सबसे बड़े जिलों में से एक हुआ करता था. दुमका ऐतिहासिक भूखंड है. ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्ति की लड़ाई लड़ने वाले सिद्धू-कानू, चांद-भैरव और फूलो-झानो यहीं पैदा हुए. मोदी सरकार की सरपरस्ती में आज एक बार फिर से कारपोरेट की गिद्ध नजर दुमका के जंगल, जमीन और संपदा पर आ टिकी है. पर्यावरण, प्रकृति व आदिवासी संस्कृति पर भी भारी खतरा मंडरा रहा है. इन सबकी रक्षा के लिए एकजुट होकर एक लंबी  लड़ाई लड़ने की जरूरत है.
बुंडू, तमाड़ (17-18 मई 2023)

पंचपरगना प्राकृतिक सौंदर्य के साथ ही अपनी क्रांतिकारी विरासत के लिए भी जाना जाता है. झारखंड में उलगुलान की शुरुआत डोंबारी के सरजमीं से ही हुई थी. बिरसा मुंडा के क्रांतिकारी इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इसी क्षेत्र से संबंधित है.

हुमटा पंचायत में रेशा जलाशय को एक बार फिर से मुख्यमंत्री ने हरी झंडी दिखा दी है. इस जलाशय को ग्राम सभा की स्वीकृति नहीं मिलने के कारण बंद कर दिया गया था. सरकार कह रही है कि यहां रैयती जमीन  है ही नहीं, जो भी जमीन है वह प्रधान और पंचों यानि पदाधिकारियों की है. उल्लेखनीय है कि इस गांव के मुंडा (प्रधान) ने जलाशय निर्माण को अपनी स्वीकृति दे दी थी लेकिन ग्राम सभा ने इसे नामंजूर कर दिया था. उनके जबरदस्त विरोध के कारण ही यह परियोजना अभी तक पूरी नहीं हो पाई.

रेशा जलाशय के बनने से यहां के गांव और जंगल डूब क्षेत्र में बदल जाएंगे. सरकार द्वारा इस परियोजना को फिर से हरी झंडी दिखाने के बाद लोगों के अंदर डर पैदा हो गया है  और एक बार फिर से चिंता के बादल मंडराने लगे हैं अगर गांव व जंगल को डूबने से बचा ना है तो लोगों को ग्राम सभा को मजबूत कर संघर्ष के लिए आगे बढ़ना होगा. लोगों को वह ताकत हासिल करनी होगी कि वे ऐसी विनाशकारी व प्रकृति तथा पर्यावरण विरोधी परियोजनाओं को बंद करा सकें.

सोने की खदान एक दूसरी बड़ी योजना भी तमाड़ के इलाके में है. बेहरा बेरा गांव जैसे कई गांवों को मिला कर बनी इस परियोजना को सरकार ने दो दशक पहले ही चालू करने की घोषणा की थी. यहां काम भी शुरू कर दिया था. आजादी के 75 साल बाद भी इस गांव में पीने के पानी तक की सुविधा नहीं है हालांकि ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत हर घर में शौचालय जरूर बना दिए गए हैं. पानी की सुविधा नहीं रहने के कारण उन शौचालयों का कोई भी उपयोग नहीं हो पाता है. गांव में एक स्कूल भी जरूर है लेकिन शिक्षक ही नहीं हैं. गांव के स्नातक ही अपने गांव के बच्चों को पढ़ा रहे हैं. गांव में आवागमन भी बहुत ही दुर्गम है. सरकारी प्रचार यह है कि खदान शुरू हाने के साथ ही गांव सारी सुविधाओं से लैस हो जाएगा. लेकिन तब लोगों के पास न तो जमीन बचेगी न ही जंगल. उनके जीवन यापन पर ही संकट पैदा हो जाएगा. गांव के मुखिया खुशलाल मुंडा ने बताया कि बहुत संघर्ष के बाद यहां सोने की खदान बनाने पर रोक लगी. बुजुर्ग शशि भूषण मुंडा ने बताया कि इस लड़ाई में कई लोगों की जान गई. पुलिस हम लोगों को उठाकर ले जाती थी और हमें नक्सली बोलकर रात-रात भर पीटती थी. फिर भी हमने लड़ाई लड़ना नहीं छोड़ा. उसी का नतीजा है कि आज हमारे बच्चे खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं. लेकिन पता नहीं यह स्थिति कब तक बनी रहेगी. उनके चेहरे पर चिंता के निशान हैं यह डर कि तमाड़ जैसे छोटे इलाके में फिर से आंदोलन खड़ा कर वे सोने की खदान को बनने से रोक पाएंगे या नहीं?

घाटशिला (25-26 मई, 2023)

सत्ता के भूखे कारपोरेट दलाल कुर्मी बनाम महतो के झूठे विवाद को हवा देने के जरिये ग्राम सभा को कमजोर कर रहे हैं, ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति से आदिवासियों के सारे अधिकार छीन लेना चाहते हैं, और जंगल-पहाड़ों को कारपोरेट के हवाले कर देने की तैयारी में हैं.

महुलीसाल गांव में सरकार ड्रोन सर्वे, प्रॉपर्टी कार्ड, ऑनलाइन जमाबंदी और भूमि बैंक बनाने की योजनाओं को पूरा करने में लगी हुई है. दरअसल यह सब जंगल को आदिवासियों से खाली करवाने की तैयारी है. सरकारी अधिकारी सूचना अधिकार कानून को भी लागू नहीं करते और मांगने पर भी कोई सूचना नहीं देते. विगत 25 मार्च को यहां के कई मौजा के लोगों ने एक बैठक संपन्न की. उन्होंने घाटशिला में चालू  होने वाली पन्ना खदान के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया है. इस क्रम में कई बार धरना-प्रदर्शन भी हुआ. लोगों ने तीन-तीन बार सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी लेकिन उन्हें किसी भी तरह की कोई सूचना नहीं दी गई. यहां ग्राम सभाओं के वजूद को खत्म करने में सरकार और जनप्रतिनिधि दोनों भागीदार हैं. जनप्रतिनिधि मौखिक रूप में समर्थन की बात करते हैं और आश्वासन देते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर कभी नहीं आते. घाटशिला के लोग अपने पड़ोस में स्थित जादूगोड़ा के लोगों को वहां यूरेनियम खदान में हो रहे खनन का खामियाजा भुगतते देख रहे हैं और उनके सामाजिक, आर्थिक और निजी जीवन में आए बदलाव से बहुत ही दुखी हैं. वे अपने जीवन में इस तरह का बदलाव कतई नहीं चाहते.

हमें कई लोगों से मिलने, उनकी बाते सुनने और कई ग्राम प्रधानों से पूछताछ करने का मौका मिला. किशन मुंडा हरियान के 6 टोला गांव के प्रधान है. यह गांव प्रभावित क्षेत्र में है. प्रधान व इस गांव के अन्य लोगों से भी बातचीत हुई. उनका कहना था कि वे अपनी जमीन के एवज में नौकरी लेकर अपने आने वाली पीढ़ियों को अंधा नहीं करना चाहते. इस गांव की कई अन्य समस्यायें भी हैं. स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर नहीं हैं. नर्स सप्ताह में एक बार आती हैं. दवाइयां भी नहीं हैं. महिलाओं की प्रसूति के लिए कोई सुविधा और नहीं है. गंभीर रूप से बीमार रोगियों के लिए 40 किलोमीटर दूर से एंबुलेंस बुलाया जाता है. स्कूल है भी तो उसमें सिर्फ दो ही शिक्षक हैं.

बौटिया गांव में हमने लगभग 40 लोगों से बातचीत की. इसमें महिलाएं, बच्चियां, छात्र-युवा और बुजुर्ग सभी शामिल थे. बातचीत में पता चला कि गांव में जनवितरण प्रणाली, वृद्धावस्था पेंशन और विधवा पेंशन समेत किसी भी सरकारी योजना की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. रही बात शिक्षा की तो पूरे गांव में केवल दो स्नातक हैं. लड़कियों को पढ़ाने का चलन थोड़ा बढ़ा है.

माइनिंग खनन के खिलाफ लंबे समय से संघर्ष कर रहे जादूनाथ हांसदा यहां के ग्राम प्रधान हैं. वे एक निजी स्कूल में अंग्रेजी के शिक्षक भी है. वे ग्रामीणों को खनन और उससे होने वाली खामियों के प्रति जागरूक करते आ रहे हैं. उनसे बातचीत में काफी जानकारियां मिली. विगत 18 जून को यहां एक कन्वेंशन भी आयोजित होना था जिसमें स्थानीय मुद्दों के साथ माइनिंग पर विशेष चर्चा होनी थी. इस कन्वेंशन में सभी 25 मौजों से लगभग 300 लोगों की भागीदारी होनी थी. गांव के सीताराम सोरेन ने भी कई महत्वपूर्ण जानकारियां दी.

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शिकारीपाड़ा (1 जून 2023)

शिकारीपाड़ा में नो पहाड़ और सिमानी जोड़ सहित 21 गांव खनन से प्रभावित हैं. नौ पहाड़ 5 टोलों का गांव है. पूरे गांव की आबादी करीब 6 सौ की है. आजादी के 75 वर्ष बाद भी यहां मात्र 50 लोग पढ़े-लिखे हैं. 10 साल पहले गांव में बिजली आई लेकिन पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है. तीन-चार महीने पहले पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था (वाटर सप्लाई) हुई है और उसके लिए भी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है. शिकारीपाड़ा प्रखंड और विधानसभा क्षेत्र में अवस्थित इस इलाके में सड़क की स्थिति अत्यंत ही जर्जर है. लोगों की आय का स्रोत खेती-बाड़ी है लेकिन सिंचाई की समस्या के कारण इस वर्ष पूरा ही इलाका सूखा ग्रस्त है. गांव के 30-35 लोग प्रवासी मजदूर के तौर पर दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी करते हैं जिससे उनके परिवारों का जीवन यापन होता है. कारपोरेट भूमि लूट के खिलाफ प्रशासन का रवैया बहुत ही प्रभावित करने वाला नहीं है. इन सभी 21 गांवों के लोग ग्रामसभा को मजबूत कर संघर्ष छेड़ने की तैयारी में हैं. वे अपने जंगल व जमीन से बेदखल होने के बाद कारपोरेट की नौकरी या प्रवास में मजदूरी कर आने वाली पीढ़ियों को बर्बाद होता नहीं देखना चाहते हैं.

लोगों से उनकी समस्याओं को जानने और सड़कों, स्कूलों व स्वास्थ्य केंद्रों की अवस्था सुधारने में यहां के जनप्रतिनिधियों की भी कोई रूचि नहीं है.

सीलेंगी शहीद हरमादेश मांझी का गांव है. इस गांव लोगों खनन के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ने के लिए एकजुट हुए हैं. गांव के लोगों ने हर साल पड़नेवाली सूखा की स्थिति, पेयजल की व्यवस्था, खेती के संकट और विस्थापन पर भी अपनी चिंता जाहिर की और समय पर सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाने की शिकायत की.

– नन्दिता भट्टाचार्यं