वर्ष - 32
अंक - 34
19-08-2023

बिहार में आशा संयुक्त संघर्ष मंच के आह्वान पर विगत 12 जुलाई 2023 से राज्य में जारी आशा व आशा फैसिलिटेटरों की अनिश्चितकालीन हड़ताल 31वें दिन समासम्मानजनक समझौते के साथ समाप्त हो गई.

इस हड़ताल की 9 सूत्री मांगों में ‘पारितोषिक’ शब्द को बदलकर ‘मानदेय’ करना, मानदेय राशि 1000 रु. प्रति माह को बढ़ाकर 10 हजार रु. प्रति माह करना, अश्विन पोर्टल लागू होने के पूर्व व बाद के सभी बकाया का भुगतान करना सहित अन्य मांगें शामिल थीं. इन मांगों पर संजय कुमार सिंह, कार्यपालक निदेशक, राज्य स्वास्थ्य समिति के साथ पहले दो चक्र की वार्ता बेनतीजा रही लेकिन सरकार के निर्देश पर पुनः 11 अगस्त को  उनके साथ आशा संयुक्त संघर्ष मंच के नेताओं शशि यादव (अध्यक्ष, बिहार राज्य आशा कार्यकर्ता संबद्ध गोप गुट-ऐक्टू), रामबली प्रसाद (सम्मानित अध्यक्ष, महासंघ गोप गुट), रणविजय कुमार (राज्य सचिव, ऐक्टू) तथा  विश्वनाथ सिंह, मीरा सिन्हा व सुधा सुमन (क्रमशः संयुक्त महामंत्री, अध्यक्ष व महासचिव, आशा व फैसिलिटेटर संघ, संबद्ध सीटू) की वार्ता हुई.

पिछले हड़ताल में तत्कालीन भाजपाई स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय द्वारा ‘मासिक मानदेय’ का वादा किया गया लेकिनइसे छलपूर्वक ‘पारितोषिक’ कर दिया गया था. सम्पन्न वार्ता में पारितोषिक शब्द को पलटते हुए महागठबंधन सरकार ने मासिक मानदेय करने पर सहमति दी. ‘पारितोषिक’ का ‘मानदेय’ में बदलना बिहार के लाखों आशा व फैसिलिटेटरों के ऐतिहासिक हड़ताल की बड़ी जीत है. यह उनके स्वाभिमान और मर्यादा से जुड़ी बात है.

सरकार आशाओं को रिटायरमेंट बेनिफिट और रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने (60 से 65 वर्ष करने) पर सरकार विचार करेगी. मासिक मानदेय में आशाओं की अपेक्षा के अनुरूप सरकार ने बदलाव नहीं किया है, आशा व आशा फैसिलिटेटरों को दी जा रही प्रति माह एक हजार राशि के अतिरिक्त प्रति माह डेढ़ हजार रु. की बढ़ोतरी करने पर सहमति बन गयी है.अब बिहार सरकार अपने खजाने से प्रतिमाह कुल 2500 रुपया मासिक मानदेय के तौर पर आशाओं को देगी.

आशा हड़ताल की 9 सूत्री मांगों में केंद्र की मोदी सरकार से आशाकर्मियों को सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने तथा इंसेंटिव राशि मे कम से कम 300 % की बढ़ोतरी करने जैसी महत्वपूर्ण मांग भी शामिल है, सम्पन्न वार्ता में बिहार सरकार के स्वास्थ्य मंत्री की ओर से एक प्रस्ताव व अनुशंसा से सम्बंधित पत्र केंद्र की मोदी सरकार को भेजे जाने पर सहमति बनी है.

वर्ष 2005 में ही पूरे देश में एनएचएम के तहत आशा बहाल हुईं, प्रत्येक काम का दाम (इंसेंटिव) का निर्धारण किया गया था. मोदी सरकार के 9 वर्षों के शासन समेत कुल 17 वर्षों में इनके इंसेंटिव राशि का एक बार भी ठोस पुनरीक्षण नहीं किया गया है जिसका नतीजा है कि बिहार सहित देश भर में कार्यरत लगभग 10 लाख से अधिक कामकाजी महिला आशा वर्कर्स आज भी 2005 के निर्धारित दर पर काम करने को अभिशप्त है. मोदी सरकार के लिए इससे बड़े शर्म की और कोई बात नहीं हो सकती.

asha-strike