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16 जुलाई 1930 को लाहौर सेंट्रल जेल का माहौल बेहद गमगीन था. उस दिन बटुकेश्वर दत्त को लाहौर सेंट्रल जेल से मुलतान जेल भेजा जाना था और इस प्रकार वे अपने प्रिय साथी भगत सिंह से बिछुड़ने वाले थे. अंग्रेज सरकार अच्छी तरह समझ चुकी थी कि क्रांतिकारियों का दो ही मुख्य नेता है – भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त. इसलिए दोनों को अलग करने की योजना बनाई गई. इसके जरिए अंग्रेजी सरकार क्रांतिकारियों के आपसी समन्वय को कमजोर करना चाहती थी. जब वे लाहौर सेंट्रल जेल से विदा हो रहे थे, सभी क्रांतिकारियों के चेहरे उदास थे, लेकिन आंखों में भविष्य  के सपने थे. भगत सिंह ने अपनी डायरी निकाली और उसमें दत्त का हस्ताक्षर लिया. लाहौर षड्यंत्र केस का फैसला आ जाने के बाद भगत सिंह ने एक बेहद मार्मिक पत्र बटुकेश्वर दत्त को लिखा – ‘मैं फांसी के तख्ते पर अपने प्राण त्यागकर दुनिया को दिखाऊंगा कि क्रांतिकारी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए खुशी-खुशी आत्म बलिदान करना पड़ता है. मैं तो मर जाऊंगा, लेकिन तुम आजीवन कारावास की सजा भुगतने के लिए जीवित रहोगे और मेरा दृढ़ विश्वास है कि तुम यह सिद्ध करोगे कि क्रांतिकारी अपने उद्देश्यों के लिए आजीवन तिल-तिल कर यंत्रणाएं सहन कर सकता है. मृत्युदंड पाने से तुम बचे हो और मिलने वाली यंत्रणाओं को सहन करते हुए दिखा सकोगे कि फांसी का फंदा, जिसके आलिंगन के लिए मैं तैयार बैठा हूं, यंत्रणाओं से बच निकलने का एक उपाय नहीं है. जीवित रहकर क्रांतिकारी जीवन भर मुसीबतें झेलने की दृढ़ता रखते हैं’.

अपनी मां को लिखे पत्र में भगत सिंह ने कहा – ‘मैं तो जा रहा हूं, लेकिन बटुकेश्वर दत्त के रूप में अपना एक हिस्सा छोड़े जा रहा हूं’. और सच में, बटुकेश्वर दत्त ने पूरी जिंदगी हजारों मुसीबतों को झेलते हुए भी क्रांतिकारी दल के सपने को जिंदा रखा व उसे आगे बढ़ाते रहे. लाहौर से मुलतान, सलेम, अंडमान, दिल्ली और फिर पटना की बांकीपुर जेल उनके संघर्षों की गाथा से भरी पड़ी हैं. आजादी के समय तक उनका जीवन लगभग एक बंदी का जीवन रहा. जेलों में यातनाओं की बर्बर शृंखलाओं ने उनके शरीर को पूरी तरह तोड़ दिया, वे बोन कैंसर के शिकार हो गए लेकिन उनकी क्रांतिकारिता पल भर के लिए भी धूमिल न हुई.

बटुकेश्वर दत्त की जिंदगी के शुरूआती दिन

बटुकेश्वर दत्त का परिवार पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के खंडाघोष थानांतर्गत ओआड़ी गांव से संबद्ध था. उनका जन्म 18 नवंबर 1911 को हुआ था, लेकिन उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा कानपुर में हुई. छात्र जीवन में ही उनके भीतर देश प्रेम की भावना जगी. तब कानपुर शहर क्रांतिकारी आंदोलन का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था. क्रांतिकारियों के संपर्क में आकर उन्होंने गैरीबाल्डी और मेजिनी की देश प्रेम की पुस्तकें पढ़नी शुरू कीं. 1924 में शचीन्द्र नाथ सान्याल ने कानपुर में ही हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संघ के नाम से एक क्रांतिकारी पार्टी का गठन किया. दत्त उनके संपर्क में आए और फिर उन्होंने कानपुर में विजय कुमार सिन्हा, अजय घोष और सुरेन्द्र नाथ पांडेय के साथ मिलकर कानपुर जिम्नास्टिक क्लब का गठन किया. हस्तलिखित पत्रिका क्रांति की शुरूआत भी की. क्रांतिकारी आंदोलनों में संलग्न होने के कारण उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट गई, लेकिन क्रांतिकारियों के ग्रुप में वे जल्द ही काफी लोकप्रिय हो गए.

भगत सिंह और दत्त की मुलाकात

कानपुर में ही पहली बार बटुकेश्वर दत्त की मुलाकात भगत सिंह से हुई. यह जोड़ी बहुत लोकप्रिय जोड़ी बन गई. दोनों ही मेधावी व बेहद अध्ययनशील थे. दत्त ने भगत सिंह को बंगाल के प्रसिद्ध कवि नजरूल इसलाम की विद्रोही कविताएं सुनानी शुरू कीं. उन कविताओं का गहरा असर भगत सिंह पर पड़ा. भगत सिंह ने दत्त से ही बांग्ला सीखी और उनकी सहायता से ही कार्ल मार्क्स की किताबें पढ़ने की शुरूआत की और यहीं पर वे हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संघ नामक क्रांतिकारी दल में शामिल हुए. ‘प्रताप’ का कार्यालय तब क्रांतिकारी आंदोलन का केंद्र था और भगत सिंह ने अखबार के प्रतिनिधि की हैसियत से कई बेहतर रिपोर्टें लिखीं.

दत्त की कानपुर से कलकत्ता की यात्रा

बटुकेश्वर दत्त की मां बनारस में रहती थीं. मां से मिलने वे बनारस पहुंचे, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद वे कानपुर लौटने की बजाए कलकत्ता चले गए. उस वक्त कलकत्ता क्रांतिकारी गतिविधियों का एक प्रमुख गढ़ था. मजदूरों व किसानों का आंदोलन भी पूरे आवेग में था. कलकत्ता में कम्युनिस्ट आंदोलन के नेता मुजफ्फर अहमद से दत्त की मुलाकात हुई. कानपुर में पैदा होने के कारण दत्त की हिंदी अच्छी थी. मुजफ्फर अहमद ने उन्हें हिंदी भाषी मजदूरों को संगठित करने के काम में लगाया. वे वहां बंगाल वर्कर्स एवं पीजेंट्स पार्टी के सदस्य बन गए और कुछ दिनों तक वहीं काम किया.

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन

साइमन कमीशन के आने के बाद सुस्त पड़ा राष्ट्रीय आंदोलन एक बार फिर पूरे आवेग से उठ खड़ा हुआ. देश भर में विशाल प्रतिरोध सभाएं आयोजित की गईं. क्रांतिकारियों के दल में भी नई हलचल थी. उस वक्त क्रांतिकारी दलों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन अधिकतर संगठनों का स्वरूप क्षेत्राीय स्तर का था. कोई अखिल भारतीय संगठन नहीं था. इसी आलोक में 1928 में दिल्ली के फिरोज शाह तुगलक किले के ऐतिहासिक खंडहरों में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन हुआ. भगत सिंह के प्रस्ताव पर संगठन के नाम में सोशलिस्ट शब्द जोड़ा गया. इस एसोसिएशन का अंतिम लक्ष्य स्वाधीनता प्राप्त करना और समाजवादी राज्य की स्थापना करना था.

सांडर्स की हत्या और भगत सिंह की बंगाल यात्रा

लाला लाजपत राय की हत्या का प्रतिरोध क्रांतिकारी दल ने सांडर्स की हत्या करके चुकाया. इस हत्या ने पूरे ब्रिटिश तंत्र को हिला दिया और क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी के लिए तीव्र दमन अभियान चलाया गया. लिहाजन, सभी क्रांतिकारियों को बाहर निकलने पर मजबूर होना पड़ा. भगत सिंह ने सरदार बाल वेश हटाया और लांग कोट व हैट पहनकर कलकत्ता पहुंचे. वहां उनकी मुलाकात एक बार फिर बटुकेश्वर दत्त से हुई. दत्त उन्हें अपने पैतृक गांव ओओड़ी लेकर पहुंचे. कुछ दिन तक दोनों वहीं पर रूके, लेकिन पुलिस को भनक लग गई. तब दोनों ने जमीन के अंदर बनी सुरंग में घुसकर अपनी जान बचाई थी. यह सुरंग आज भी उस गांव में मौजूद है.

असेंबली बम विस्फोट

ट्रेड डिस्प्यूट बिल व पब्लिक सेफ्रटी बिल के खिलाफ एचएसआरए ने भगत सिंह के सुझाव पर असेंबली में बम फेंककर गिरफ्तारी देने और अपने दल के विचारों को जनता के बीच ले जाने की योजना बनाई. जब असेंबली में बम विस्फोट के लिए क्रांतिकारियों के चयन की बात आई तो भगत सिंह व सुखदेव का नाम आया. इस पर शांत रहने वाले बटुकेश्वर दत्त लगभग उबल पड़े. उन्होंने दल का सबसे पुराना साथी बताते हुए इस एक्शन में खुद को शामिल करने की मांग की. अंततः काफी बहस के बाद योजना बनी कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ही असेंबली में बम फेंकने जायेंगे और आजाद एवं अन्य दो सदस्य उनको बचाने की कोशिश करेंगे. भगत सिंह ने आगे बढ़कर दत्त के नाम का समर्थन किया था. दत्त को इस बात की बेहद खुशी हुई कि भगत सिंह ने उनके नाम पर सहमति व्यक्त की.

भगत सिंह और दत्त ने 3 अप्रैल व 6 अप्रैल 1929 को संयुक्त रूप से असेंबली भवन का निरीक्षण किया और सारी चीजों के बारे में एक सटीक व्यूह रचना तैयार कर ली. दिल्ली के कश्मीरी गेट पर रामनाथ फोटोग्राफर के यहां दोनों ने अपनी तस्वीरें खिंचवाईं. बाद में उसी फोटो का सभी स्थानों पर प्रयोग हुआ. 8 अप्रैल 1929 को असेंबली की कार्रवाई 11 बजे आरंभ हुई. जैसे ही असेंबली के अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल अपने आसान से उठे, भगत सिंह और दत्त ने अपनी जेब से अखबार के टुकड़ों में लिपटा बम निकाला और गृह सदस्य सर जाॅर्ज शुस्टर के ठीक पीछे वाली सीट के आगे फेंक दिया. इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद का नाश हो, दुनिया के मजदूरों एक हो, के नारों से सदन गूंज उठा. दत्त ने इसी बीच गुलाबी रंग के कई परचे सदन में फेंके. परचे में एचएसआरए का नोटिस था और इसकी शुरूआत ‘बहरों को सुनाने के लिए ऊंची आवाज की जरूरत होती है’, से की गई थी. बम फेंकने के बाद दोनों अपनी सीट पर यथावत बैठे रहे. इंस्पेक्टर जाॅनसन व टैरी ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया. जब दोनों नवयुवक गिरफ्तार होकर चले तो पूरा सदन इंकलाब के नारों से गूंज उठा.

जवाहर लाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा है – 8 अप्रैल को जब केंद्रीय असेंबली में ट्रेड डिस्प्यूट बिल पारित हुआ और अध्यक्ष विट्ठल भाई पटेल पब्लिक सेफ्टी बिल पर अपनी रूलिंग देने के लिए खड़े हुए, ठीक उसी समय एचएसआरए नोटिस शीर्षक लिए हुए एक लाल इश्तहार के साथ दो बम दर्शक दीर्घा से सदन में फेंके गए. अभियुक्तों ने जैसा कि बाद के बयान में कहा कि, बम फेंकने का उद्देश्य आवाज करना था, हलचल मचाना था, किसी को आहत करना नहीं था.

देशव्यापी प्रतिक्रिया

इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को स्तब्ध कर दिया. अंग्रेज सरकार की शासन प्रणाली की चौतरफा आलोचना शुरू हो गई. यह घटना पूरी दुनिया में दमनकारी नीतियों के विरोध के एक सशक्त माध्यम की मिसाल बन गई. बिहार में भी तीव्र प्रतिक्रिया हुई. पटना में भगत सिंह व दत्त के चित्र सहित एक इश्तहार की प्रतियां बिकीं. दो इश्तेहार चिपकाए गए – (1) भूख हड़तालियों के प्रति सहानुभूति दिखाओ, रक्षा कोष हेतु चंदा दो. (2) प्रत्येक राष्ट्र को दमन व अत्याचार के विरूद्ध विद्रोह करने का अधिकार है. बम विस्फोट की घटना के कारण पब्लिक सेफ्टी बिल पारित नहीं हो सका था. विट्ठलभाई पटेल और सरकार के बीच विवाद हो गया. पटेल ने दूसरी बार बिल को सदन में पेश करने की अनुमति नहीं दी.

भगत सिंह को चांदनी चौक स्थित कोतवाली और दत्त को रायसीना हिल्स संसद मार्ग स्थित कोतवाली में रखा गया. 22 अप्रैल को दोनों क्रांतिकारियों को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

अदालती कार्रवाई का दिखावा और आजीवन कारावास

अदालती कार्रवाई दिल्ली जेल में शुरू हुई. पहले दिन भगत सिंह ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और दत्त ‘नौकरशाही मुर्दाबाद’ का नारा लगाते हुए अदालत पहुंचे. अंग्रेजी सरकार इस मामले को जल्द से जल्द निपटाना चाहती थी. लिहाजन, 4 जून को दिल्ली के सेशन कोर्ट में मुकदमे की कार्रवाई जेल के भीतर बनी अदालत में शुरू हुई. अभियोजन पक्ष के बाद भगत सिंह व दत्त की बारी आई. उन्होंने अपना लिखित बयान पढ़ना शुरू किया. इसके माध्यम से क्रांतिकारियों ने अपने दल के उद्देश्यों को दुनिया के सामने प्रस्तुत करना शुरू किया. 12 जून को अदालत का फैसला आया. दोनों को आजीवन कारावास की सजा दे दी गई. सेशन जज ने अभियुक्तों की किसी भी दलील को स्वीकार नहीं किया.

सजा मिलने के बाद भगत सिंह को मियांवाली व दत्त को लाहौर सेंट्रल जेल ले जाया गया. भगत सिंह 15 जून को  मियांवाली जेल पहुंचे. वहां गदर आंदोलन के नेता बंद थे. मियांवाली जेल पहुंचने के बाद भगत सिंह को पता चला कि 26 जून 1929 से सांडर्स हत्याकांड की सुनवाई शुरू होने वाली है. इसके अन्य अभियुक्त लाहौर के बोस्र्टल जेल में बंद थे. भगत सिंह ने मांग की कि लाहौर केस के सभी अभियुक्तों को एक ही जेल में स्थानांतरित कर दिया जाए ताकि वे अपने मुकदमे की लड़ाई लड़ सकें. अंततः भगत सिंह को लाहौर सेन्ट्रल जेल स्थानांतरित कर दिया गया.

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भगत सिंह व दत्त से हुए अन्याय के खिलाफ जिन्ना के क्रोध का विस्फोट

एडिशिनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की अदालत में मो. जिन्ना दोनों क्रांतिकारियों का मुकदमा लड़ना चाहते थे, लेकिन दोनों क्रांतिकारी नहीं चाहते थे कि अदालत में उनकी ओर से कोई पैरवी की जाए, लेकिन बाद में प्रख्यात वकील आसफ अली ने इस मुकदमे में वकालत की.

मात्र एक महीने के अंदर सनुवाई पूरी कर भगत सिंह व दत्त की सजा से मो. अली जिन्ना काफी आहत हुए. उन्होंने दोनों क्रांतिकारियों के पत्र का हवाला देते हुए सेंट्रल असेंबली में अपने वक्तव्य में सरकार द्वारा अपने नागरिकों के साथ सख्ती से दमन करने के व्यवहार की कड़ी आलोचना की. कहा कि यह बेहतर नहीं होता कि जनता की इस नाराजगी और संघर्ष के कारणों की जड़ तक सरकार जाती और उन्हें समझती. जिन्ना ने सवाल किया कि उनपर मुकदमा चलाया जा रहा है अथवा उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है? उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिटिश राज में लगता है कि पंजाब एक भयावह जगह में तब्दील हो गई है.

जेल में क्रांतिकारियों की भूख हड़ताल

राजनैतिक बंदी के दर्जे की मांग पर कुछ ही दिनों में भगत सिंह व दत्त ने अनशन शुरू कर दिया. लाहौर षड्यंत्र के अन्य अभियुक्तों ने भी कहा कि यदि भगत सिंह व दत्त की बात नहीं मानी गई तो वे भी अनशन कर देंगे. जेल में दुर्व्यवहार के खिलाफ 15 जून 1929 से दोनों नौजवानों ने अनशन शुरू किया. उनके समर्थन में 30 जून को पूरे देश में ‘भगत सिंह-दत्त दिवस’ मनाया गया. अनशन से दोनों काफी कमजोर हो गए. इस बीच दत्त को निर्दयतापूर्वक पीटा गया. जिसके कारण उनका स्वास्थ्य गिरने लगा. जेल अधिकारियों ने अनशन खत्म करवाने के लिए तरह-तरह के जुल्म ढाये. इसी बीच लाहौर बोस्र्टल जेल में यतीन्द्रनाथ दास को जबरन दूध पिलाया गया, जो उनके फेफड़े में चला गया और उनकी हालत गंभीर हो गई. इसे देखते हुए भगत सिंह व दत्त ने अपने क्रांतिकारी साथियों को संदेश भेजा कि केवल वे दोनों ही अनशन पर रहेंगे, बाकि हड़ताल तोड़ दें, लेकिन उनकी बात किसी ने नहीं मानी. अंततः पंजाब जेल जांच समिति नामक एक उपसमिति के गठन के बाद भूख हड़ताल समाप्त हुई, लेकिन यतीन्द्रनाथ दास नहीं माने. क्रांतिकारियों से जेल में मिलने पंडित जवाहरलाल नेहरू पहुंचे. उन्होंने अखबारों में बयान दिया. यतीन्द्रनाथ द्वारा हड़ताल जारी रखे जाने के कारण भगत सिंह फिर से हड़ताल पर चले गए. अंततः यतीन्द्रनाथ की मौत हो गई.

लाहौर षड्यंत्र की सुनवाई और भगत सिंह-दत्त का हमेशा के लिए वियोग

स्पेशल मजिस्ट्रेट की अदालत में लाहौर षड्यंत्र केस के अभियुक्त खड़े हुए, तो आने वाले समय और नए राष्ट्र की एक प्रतिनिधि तस्वीर उभरती दिखलाई पड़ी. जिसमें देश के हर प्रांत के लोग थे – भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, सुखेदव, राजगुरू, विजय कुमार सिन्हा, जितेन्द्र सान्याल, जयदेव कपूर, आज्ञाराम, महावीर सिंह, अजय घोष, कमलनाथ तिवारी, किशोरीलाल, शिव वर्मा, गया प्रसाद, सुरेन्द्र पांडे, कुंदनलाल, देशराज और प्रेमदत्त.

लाहौर षड्यंत्र केस में दत्त को इस आधार पर रिहा कर दिया गया कि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं है; जबकि भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरू को पफांसी की सजा हुई. इस कारण भगत सिंह के साथ फांसी के तख्तों पर चढ़ने की दत्त की इच्छा अधूरी रह गई. दिल्ली असेंबली बम कांड में भगत सिंह और दत्त को आजीवन कारावास की सजा मिली थी. दत्त की वह सजा बरकरार रही. दत्त को पहले मुल्तान जेल और फिर मद्रास प्रेसीडेंसी की सलेम जेल भेजा गया. वहां उन्हें सी श्रेणी का दर्जा दिया गया, जबकि कानूनन उन्हें बी श्रेणी का दर्जा मिलना चाहिए था. भगत सिंह के बिना अधूरे दत्त लगभग दो सालों तक सलेम जेल में रहे. कुछ ही दिन बाद कमलनाथ तिवारी एवं कुंदनलाल को भी सलेम जेल में ही स्थानांतरित कर दिया गया. बटुकेश्वर दत्त ने कुछ ही दिनों में सत्याग्रही कैदियों से दोस्ती कर ली.

दत्त को कालापानी की सजा और अंडमान के कैदियों का ऐतिहासिक आंदोलन

दो वर्षों में तूफानी एचएसआरए के संघर्ष की धार कुछ मंद पड़ने लगी थी. भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव को फांसी दे गई थी. चंद्रशेखर आजाद, यतींद्रनाथ दास एवं भगवतीचरण वोहरा शहीद हो गए थे और अन्य सभी क्रांतिकारी गिरफ्तार हो चुके थे.

लेकिन उम्मीद की रौशनी खत्म नहीं हुई थी. सजायाफ्ता क्रांतिकारियों का दल अब कालापानी की ओर रवाना हो चुका था, लेकिन वे एक साथ थे. 23 जनवरी 1933 को बटुकेश्वर दत्त अपने अन्य साथियों विजय कुमार सिन्हा, कमलनाथ तिवारी, महावीर सिंह, कुंदनलाल एवं डाॅ. गया प्रसाद के साथ अंडमान पहुंचे. अंडमान जेल को यूं ही कालापानी नहीं कहा जाता था. वह एक तरह से यातना गृह ही था. कैदियों की दुर्दशा देखकर दत्त से रहा नहीं गया और उन्होंने कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार पर रोक लगाने की दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ एक बार फिर मोर्चा संभाल लिया. जेल में बंद रहकर दत्त सिर्फ यही काम कर सकते थे और उसे ही उन्होंने आजादी का पर्याय बना दिया. वे अंडमान के संघर्ष के नायक बनकर उभरे. फरवरी 1933 में उन्होंने अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर भूख हड़ताल शुरू कर दी. ग्रेड सी के सभी 56 कैदी भूख हड़ताल के समर्थन उतर आए.

हड़ताल के पाचवें दिन जेल अधिकारियों ने कहर ढाया. महावीर सिंह को दस-बारह लोगों ने जमीन पर पटक दिया और उनकी नाक के माध्यम से मुंह में नली डालकर दूध उड़ेल दिया, जो उनके फेफड़े में चला गया. रात में उनकी मौत हो गई. अंडमान प्रशासन के लिए यह सामान्य घटना थी, लेकिन क्रांतिकारी फिर भी भूख हड़ताल पर डटे रहे. हर दिन उनकी बेरहमी से पिटाई की जाती, लेकिन उनके चेहरे पर निराशा के कोई भाव नहीं उभरते. अनशन के क्रम में पटना के रहने वाले मोहित मित्र और मोहन किशोर भी शहीद हो गए. 46 दिनों की लंबी भूख हड़ताल के बाद हड़तालियों की मांग स्वीकार की गई और भूख हड़ताल समाप्त हुई.

इस आंदोलन के बाद क्रांतिकारी दल ने लड़कर बौद्धिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों में ढील हासिल कर ली. सरकारी खर्च पर अब जेल में पत्र-पत्रिकाएं आने लगीं. भोजन व्यवस्था में सुधार, रौशनी की पर्याप्त व्यवस्था, पत्राचार की सुविधा, चिकित्सा सुविधा आदि मांगें मान ली गईं. जेल में पुस्तकालय की भी व्यवस्था हुई. रसोईघर का नियंत्रण भी बंदियों के हाथ में आ गया.

उसके बाद बटुकेश्वर दत्त ने अपने साथियों के साथ हस्तलिखित पत्रिका का प्रकाशन, वाद-विवाद, राजनीतिक गोष्ठियों आदि के आयोजन की शुरूआत की, जो देश की आजादी के लिए समर्पित था. करीब 35 क्रांतिकारियों के साथ मिलकर कम्युनिस्ट कंसोलिडेशन की स्थापना की. बटुकेश्वर दत्त, विजय कुमार सिन्हा, शिव वर्मा, डाॅ. नारायण राय, जयदेव कपूर आदि क्रांतिकारी इन राजनीतिक गोष्ठियों के मुख्य केंद्रक थे.

अंडमान जेल में 1937 में दूसरी बार हड़ताल शुरू हो गई, जिसमें कुल 183 कैदियों ने भाग लिया. तीन वर्षों तक कैदियों ने अपने जिन अधिकारों को बनाए रखा, वे अधिकार अब छीनने लगे थे. इस बीच, 1935 के अधिनियम के आधार पर राज्यों में देशी सरकार बन गई थीं. बिहार विधानसभा में अंडमान के बंदियों की भूख हड़ताल को लेकर सवाल उठे. तब अंडमान में बंगाल के 339, बिहार के 19, यूपी के 11, असम के 5, पंजाब के 3, दिल्ली के 2 और मद्रास के 2 बंदी शामिल थे. तत्कालीन बिहार के प्रधानमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने इस संबंध में केंद्र सरकार व पोर्टब्लेयर सरकार को पत्र लिखा. अंडमान के कैदियों की भूख हड़ताल का असर देश की अन्य जेलों पर भी पड़ा और उनके समर्थन में लोग उतरने लगे. उनकी रिहाई की मांग एक सर्वव्यापी मुद्दा बनने लगी. जेल अधिकारी जबरदस्ती दूध पिलाने की तरकीब से भूख हड़ताल खत्म करना चाहते थे. इस बीच कई बड़े राष्ट्रीय नेताओं ने सरकार को पत्र लिखकर भूख हड़ताल समाप्त कराने का आह्वान किया. जेल प्रशासन को क्रांतिकारियों के सामने झुकना पड़ा. सरकार ने अंततः आश्वासन दिया कि अंडमान के जेल में बंद कैदियों को भारत की जेलों में स्थानांतरित कर दिया जाएगा. इस प्रकार 18 जनवरी 1938 तक अंडमान से सभी कैदियों को देश के मुख्य स्थल पर स्थानांतरित कर दिया गया.

बटुकेश्वर दत्त का बिहार के बांकीपुर जेल में आगमन

अंततः कालापानी से दत्त दिल्ली की जेल पहुंचे, क्योंकि वे असेंबली बम कांड के कैदी थे. लेकिन तब तक उनकी हालत बेहद खराब हो चुकी थी. जेल में उनसे मिलने डा. राजेन्द्र प्रसाद पहुंचे और हालात से जवाहर लाल नेहरू को अवगत कराया. तब, बिहार की बांकीपुर जेल में एचएसआरए से जुड़े तकरीबन 40 बंदी थे, जिनमें अधिकांश अंडमान में भी थे. इसी समय डा. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में पाॅलिटिकल प्रिजनर्स रिलीफ कमिटी का गठन हुआ था. राजेन्द्र बाबू की समझदारी थी कि यदि दत्त अपने अंडमान के साथियों के साथ बिहार की जेल में रहें, तो उनकी सेहत के लिए अच्छा होगा. वहां वे अपने साथियों के साथ घुल-मिल जायेंगे. उनके आग्रह पर बटुकेश्वर दत्त को बांकीपुर जेल, पटना में स्थानांतरित कर दिया गया. लेकिन उनकी हालत बिगड़ती ही चली गई.

28 जुलाई 1938 को बिहार के प्रधानमंत्री श्री कृष्ण सिंह को डा. राजेन्द्र प्रसाद ने पत्र लिखा और स्वास्थ्य के आधार पर उनकी रिहाई का अनुरोध किया. 1 सितंबर 1938 को महात्मा गांधी ने बंगाल के गवर्नर व कार्यवाहक वाइसराय को चिकित्सा के आधार पर दत्त को रिहा करने का तार भेजा. 3 सितंबर 1938 को केंद्रीय असेंबली के सदस्य मोहन लाल सक्सेना दत्त का हालचाल लेने बांकीपुर जेल पहुंचे. 4 सितंबर को सर्चलाइट अखबार ने दत्त को रिहा करने की मांग की. इन आग्रहों के बाद 8 सितंबर 1938 को दत्त बांकीपुर जेल से रिहा हुए और उसके बाद पटना में अपने बड़े भाई विशेश्वर दत्त के साथ जक्कनपुर में रहने लगे.

भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और जेल

दत्त का स्वास्थ्य लगातार गिरते ही जा रहा था, लेकिन आजादी की लहरें इस वक्त उफान मार रही थीं. अप्रैल 1939 में कानपुर किसान संघ एवं जिला राजनीतिक अधिवेशन में दत्त उपस्थित हुए. 1939-40 के वे कांग्रेस के अधिवेशन में भी शामिल हुए.

1942 के आंदोलन में एक बार फिर उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई. उन्हें पुनः मोतिहारी व मुजफ्फरपुर के जेल में बंद कर दिया गया और कई गंभीर यातनाएं दी गईं. इसके विरोध में वे पुनः भूख हड़ताल पर चले गए. जेल के खराब वातावरण से उनका फेफड़ा पूरी तरह बेकार हो गया था. तब 1945 में पटना निवास को ही होम इंटर्न बना दिया गया और वे पूरी तरह से नजरबंद कर दिए गए. कुछ दिनों के लिए देवघर में भी नजरबंद करके रखा गया. देश की आजादी के बाद ही उनकी रिहाई संभव हो सकी.

आजादी के बाद का दौर

आजादी के बाद के दौर में भी दत्त का जीवन संघर्षों से भरा रहा. उन्हें जीविकोपार्जन के लिए छोटे-छोटे काम करने पड़े, लेकिन उन्होंने कभी शर्मिंदगी महसूस नहीं की. यहां तक कि पटना से दानापुर तक बसें चलवाईं. बाद में पत्नी जब सरकारी शिक्षिका बन गईं, तब थोड़ी सी राहत उन्हें अवश्य महसूस हुई. 1963 में एक वर्ष के लिए बिहार विधान परिषद् की सीट पर उनका मनोनयन भी हुआ, लेकिन उन्होंने कभी भी किसी प्रकार की सुविधा का लाभ नहीं उठाया. यहां तक कि आवास का भी उपयोग नहीं किया.

1963-64 में भारतीय संसद द्वारा प्रकाशित दस्तावेज में भगत सिंह व दत्त को आतंकवादी बताने से दत्त को काफी कष्ट हुआ और इसको लेकर वे प्रधानमंत्री नेहरू से मिले. नेहरू के सामने उन्होंने कड़ी आपत्ति दर्ज की. नेहरू ने अपनी गलती महसूस की और कहा कि दत्त जैसे महान व्यक्ति से मिलना उनके लिए प्रसन्नता की बात है. उन्होंने यह भी कहा कि हम सबका लक्ष्य एक है. कुछ दिन बाद जब नेहरू की मृत्यु हो गई तो दत्त काफी दुखी हुए और उसे एक युग के अंत की संज्ञा दी. कम्युनिस्ट नेता मुजफ्फर अहमद अपने संस्मरणों में लिखते हैं कि दत्त कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य तो नहीं बने, लेकिन हमेशा नजदीक रहे. दत्त के अनुरोध पर कई लोगों को कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल कराया गया.

दत्त जब खटकल कलां पहुंचे

1963 में जब बटुकेश्वर दत्त भगत सिंह के गांव खटकल कलां पहुंचे, तो पूरे गांव में जश्न का माहौल था. गांव वालों को ऐसा महसूस हा रहा था कि 33 वर्षों बाद बटुकेश्वर दत्त की शक्ल में भगत सिंह ही लौटा है. मां विद्यावती देवी दत्त से लिपट कर रोती रहीं जैसे वह भगत सिंह से ही मिल रही हों. मां विद्यावती देवी ने बटुकेश्वर दत्त के परिवार को एक तरह से गोद ले लिया और उनकी बेटी की शादी का सारा जिम्मा उन्होंने ही संभाला.

अस्पताल में दत्त के साथ मां विद्यावती देवी

1965 के शुरूआती महीने मे बटुकेश्वर दत्त की हालत बहुत बिगड़ गई थी. उन्हें बोन कैंसर था. भगत सिंह की मां विद्यावती देवी को जब इसका पता चला तब वे बहुत दुखी हुईं. वे इलाज के दौरान अधिकांश समय दिल्ली में रहीं, जबकि उस वक्त उनकी उम्र 85 वर्ष थी. उन्होंने अपने सारे पैसे दत्त के इलाज पर खर्च किए. 13 जुलाई 1965 को उनकी हालत अचानक गंभीर हो गई. जब इसकी सूचना माता विद्यावती देवी को मिली तो उनसे रहा नहीं गया और वे कार से ही दिल्ली पहुंच गईं. अस्पताल पहुंचते ही उन्होंने अपनी गोद में दत्त का सिर रख लिया. उस वक्त विद्यावती देवी भगत सिंह द्वारा फांसी के पूर्व कहे गए शायद अंतिम शब्दों को याद कर रही थीं – मैं तो अब चला जाऊंगा, परंतु अपना एक हिस्सा दत्त के रूप में छोड़े जा रहा हूं.  20 जुलाई 1965 की रात दत्त का निधन हो गया. उनकी इच्छा के मुताबिक 21 जुलाई को भारत-पाकिस्तान सीमा से कुछ दूर हुसैनीवाला में उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहां पर पहले से ही भगत सिंह, सुखेदव एवं राजगरू की समाधि है. इस तरह 34 वर्षों के अंतराल के बाद बटुकेश्वर दत्त कभी न जुदा होने वाले अपने शहीद साथियों के साथ जा मिले.

बटुकेश्वर दत्त ने भगत सिंह के अंतिम शब्दों को हमेशा याद रखा और पूरी जिंदगी हर कदम पर यंत्रणाएं झेलते हुए क्रांतिकारी उद्देश्यों व आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ाने के काम में लगे रहे.

“जालिम फलक ने लाख मिटाने की फिक्र की
हर दिल में अक्स रह गया, तस्वीर रह गई.”